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ग्रहो के षडबल


हर ग्रह का स्वभाव अलग-अलग होता है और व्यक्ति विशेष का स्वभाव भी ग्रह के मुताबिक ही होता है। ऐसे में ग्रहों की स्थिति, युति और भावों के विचार के साथ ग्रहों के बलों को भी प्रमुखता से देखना चाहिए, जिससे जातक जीवन में पूर्ण संतोषजनक फलित प्राप्त कर सकें। ग्रहों के छह प्रकार के बल बताए गए हैं। बलवान ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार जिस भाव में रहता है, उस भाव का फल देता है। इसलिए इसे ग्रह स्वभाव और राशि स्वभाव का समन्वय समझना चाहिए। 
आइए जानें हैं, इन बलों के बारे में

स्थान बल: जो ग्रह उच्च, स्वग्रही, मित्रग्रही, मूलत्रिकोणस्थ, स्वनवाशस्थ अथवा द्रष्काणस्थ होता है, वह ग्रह स्थान बली होता है।

दिग्बल: बुध और गुरु लग्न में रहने, शुक्र एवं चंद्रमा चतुर्थ में रहने से, शनि सप्तम में रहने से एवं सूर्य और मंगल दशम स्थान में रहने से दिग्बली होते हैं।

कालबल: रात में जन्म होने पर चंद्र, शनि और मंगल तथा दिन में जन्म होने पर सूर्य, बुध और शुक्र ग्रह काल बली होते हैं।

नैसर्गिक बल: शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्र व सूर्य उत्तरोत्तर बली माने गए हैं।

चेष्टा बल: मकर से मिथुन तक किसी भी राशि में रहने से सूर्य और चंद्रमा एवं चंद्रमा के साथ रहने से मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह चेष्टा बली होते हैं।

दृग्बल: शुभ ग्रहों से दिखाई देने वाले ग्रह दृग्बली कहे जाते हैं।

इन छः प्रकार के बलो के द्वारा ही किसी ग्रह की सही स्थिति एवं बल की जानकारी होती हैं।

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