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कमलासना लक्ष्मी की पूजा से वैभव


भगवान विष्णु संसार के पालनकर्ता हैं और लक्ष्मीजी उनके इस कार्य में सहयोगिनी शक्ति हैं। मनुष्य जिस सुख, संपति, ऐश्वर्य की चाहत रखता है, वह लक्ष्मी का ही स्वरूप है। लक्ष्मी कृपा से ही प्राणियों की अपेक्षाएं जन्म लेती हैं और पूरी भी होती हैं। शास्त्रों में लक्ष्मी और श्री को कहीं-कहीं एक ही रूप और कहीं-कहीं भिन्न-भिन्न रूपों में दर्शाया गया है। देवी लक्ष्मी समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं। घर में समृद्धि आए, लोगों के बीच मान-सम्मान बढ़े, ऐसा हर कोई चाहता है। पर यह सुख उन्हीं को प्राप्त है, जो लक्ष्मी जी के रूपों के सही अर्थ समझकर उनकी उपासना करते हैं। यजुर्वेद में श्री और लक्ष्मी दोनों को ही भगवान विष्णु की सहयोगिनी बताया गया है। श्री का संबंध सद्बुद्धि, सदाचार, सत्संगति और गुण-संपन्नता से है, जबकि लक्ष्मी का संबंध ऐश्वर्य भोग से है। इस तरह मां लक्ष्मी को दो रूपों में पूजा जाता है। एक कमल पर विराजमान लक्ष्मी स्वरूप और दूसरा उल्लू पर बैठी लक्ष्मी मां।

शास्त्रों की मानें तो कमल के आसन पर बैठी मां लक्ष्मी की ही कामना आवश्यक है, उलूकवाहन स्वरूप की वर्जना की गई है, क्योंकि कमल पुष्प के आसन पर विराजमान लक्ष्मी सात्विक और राजसिक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली हैं, जबकि उलूक पर विराजमान लक्ष्मी तामसिक धन और तामस प्रवृत्तियों की अधिष्ठात्री हैं। घर में धन आए और उसका सदुपयोग हो। वह धन सही कार्य में उपयोग किया जा सके, यह कामना प्रत्येक व्यक्ति की होती है, लेकिन धन आए और जुआ, सट्टा और बुरे व्यसनों में खर्च हो, ऐसी कामना तो कोई भी नहीं करता। यदि धन यानी लक्ष्मीजी उल्लू पर सवार होकर घर में आएं, तो परिवार में दुर्गुण प्रकट होने लगते हैं। शुभ लक्ष्मी जिससे परिवार का विकास हो और पीढ़ी-दर-पीढ़ी समृद्धि बनी रहे इसके लिए धनोपार्जन के समय अवश्य ध्यान रखें कि लक्ष्मीजी आपके यहां उल्लू की अपेक्षा कमल पर विराजमान होकर आएं। कमल आसन पर विराजमान लक्ष्मी अपने साथ सदाचार और गुण संपन्नता भी धन के साथ लाती हैं।

नियमानुसार शास्त्रों में जो मार्ग आजीविका के लिए प्रशस्त बतलाए गए हैं, उनके माध्यम से यदि घर में धन आता है, तो लक्ष्मीजी कमलासना हो जाती है। परंतु यदि अनैतिक साधनों व मार्गों से धन का आगमन हो, तो लक्ष्मीजी उलूक वाहना हो जाती हैं। शास्त्रों में इस विषय को स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है। यदि अपनी कुल आय (धन) का कुछ प्रतिशत दान-पुण्य, परोपकार, धार्मिक व सामाजिक कार्य आदि में खर्च कर दिया जाए, तो आय यानी धन की शुद्धि हो जाती है। अर्थात् धर्म-पुण्य व परोपकार के कार्यों से उलूक पर बैठी लक्ष्मी का आसन बदलकर कमलासन किया जा सकता है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार, गृहस्थ को हमेशा कमलासना लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। देवी भागवत में कहा गया है कि कमलासना लक्ष्मी की आराधना से इंद्र ने देवाधिराज होने का गौरव प्राप्त किया था। इंद्र ने लक्ष्मी की आराधना ‘ॐ कमलवासिन्यै नम:’ मंत्र से की थी। यह मंत्र आज भी अचूक है। दीपावली के दिन या किसी भी शुभ दिन से यदि अपने घर के ईशानकोण में कमलासना पर मिट्टी या चांदी की लक्ष्मी प्रतिमा को विराजित कर, श्रीयंत्र के साथ उक्त मंत्र से पूजन किया जाए और निरंतर जाप किया जाए, तो चंचला लक्ष्मी स्थिर होती है। घर में सुख-समृद्धि आती है और व्यापार आदि में पदोन्नति मिलती है। इसलिए हमेशा सद्मार्ग पर चलते हुए धन अर्जन करें, यह लक्ष्मी आपके जीवन को सुखमय बना देंगी।

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